बबिता जोसफ की कविता: श्वास अवरुद्ध, खामोशियों का घोर पहरा है

श्वास अवरुद्ध ,खामोशियों का घोर पहरा है
शहर गतिरुद्ध ,तबाहियों का शोर पसरा है।

स्तब्ध है मन,सदमों का असर गहरा है
लाचार हैं जन,पैरों में ख़ौफ़ जकड़ा है

बिछड़े हैं जन पहन अपरस कफन
उजड़े हैं अमन , बने निर्झर नयन

तप रही धरा, कंप रहा गगन
धधक रही चिताऐं , है संतप्त पवन

बिखरी है राख, घिर गया है तम
जख्मी है मन , भर गया है गम

उजड़ी धरा का सुन करुण रुदन
बरस भी जा , बन करुण घन

रहम करो अब हे भगवन
बिलख रहे हैं, सब तेरे जन

स्तब्ध है मन,सदमों का असर गहरा है
फिर भी न जाने क्यों ये दिल कह रहा है
बदलेगा वक़्त, वक़्त कब ठहरा है
रात के बाद, रुका कब सबेरा है।

– बबिता जोसफ

बबिता जोसफ जानी मानी कवित्री हैं। वे कविताओं में अपनी पंक्तियों के ज़रिये हालातो और परिस्थितियों का वर्णन करने के लिए पहचानी जाती हैं। अपनी इस नई कविता में बबिता जोसफ ने कोरोना महामारी से दुनियाभर में पैदा हुए हालातो को बयां किया है।

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