बबिता जोसफ की कविता: ‘तृण – तृण जोड़ पक्षियों ने दरख़्त में गांव सलोना बसाया है’

बादलों की छांव तले
तृण-तृण जोड़ पंछियों ने
दरख़्त पर गांव सलोना बसाया था।
आंखों में सुंदर ख्वाब सजाया था।
असफल प्रयासों में पर्ण तृण ,
धरा पर कई बार गिराया था।
फिर भी धैर्य ,परिश्रम का सबक ,
सबने गले से लगाया था।
हर चुनौती नें हौंसलों का ,
कद और भी बढ़ाया था।

बेदर्द आंधियों ने बरपाया था कहर,
चहकता था जीवन कल तक नीड में,
तबाही का मंजर था आज ,
पंछियों की भीड़ में।

ओ अबोध परिंदे ,आंधियों ने
ढाए पहले भी कई बार शजर।
उजड़ गया है जो तेरा घर
तेरी खुशी यूं न जाए बिखर।

देख उठती लहरों के तीव्र वेग
नाविक भी तट पर घबराता है।
थाम ले जो बढ़ कर पतवार ,
तूफां में साहिल वह पाता है।

अंधेरी राहों में देखा है ,
कई बार जुगनुओं को ,
खुद जल कर राह जगमगाते हुए।
लड़ी तमर की मरुभूमि में,
मृदु रस खंड बरसाते हुए।।

–बबिता जोसफ

अपनी कविताओं से हिंदी काव्य के क्षेत्र में पहचान अर्जित करने वाली बबिता जोसफ सामयिक विषयो को पंक्तियों के माध्यम से रेखांकित करने के लिए जानी जाती हैं। वे अपनी कविताओं में दुनिया की वर्तमान स्थितियों और परिस्थितियों का सजीव चित्रण करती हैं।

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