बादशाह अकबर के सबसे करीबी रहे ‘बीरबल’ हिन्दू थे, लेकिन नहीं था धर्म को लेकर कोई टकराव

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ब्यूरो । मुगल सम्राठ अकबर और बीरबल के किस्से आज भी मशहूर हैं । मुगल सम्राठ अकबर मुस्लिम थे जबकि बीरबल हिन्दू थे । इतिहास गवाह है कि दौनो के बीच में कभी धर्म को लेकर कोई विवाद पैदा नहीं हुआ बल्कि सम्राठ अकबर हर विषय पर बीरबल की राय लेते थे । हालाँकि अकबर बीरबल के इस आपसी प्रेम और सामान विचारधारा से मुग़ल दरबार के कई दरबारियों को जलन होती थी ।

सम्राठ अकबर और बीरबल के धर्म अलग अलग होने बावजूद कभी धर्म को लेकर विवाद पैदा होने के प्रमाण नहीं मिलते । इतिहास में ऐसा कोई ज़िक्र नहीं है जिससे यह साबित हो कि कभी सम्राठ अकबर और बीरबल के बीच में धर्म को लेकर कोई बहस या मनमुटाव पैदा हुआ हो । हालाँकि सम्राठ अकबर के अन्य दरबारियों में अधिकतर मुसलमान थे, इसके बावजूद अकबर बीरबल से ही सलाह लेना पसंद करते थे ।

मामला रियासत की जनता से सम्बंधित हो अथवा युद्ध और सेना से जुड़ा , अकबर को बीरबल की सलाह पर ज़्यादा भरोसा था । इतिहास में ऐसे संकेत हैं कि सम्राठ अकबर अपने पारिवारिक मामलो में भी बीरबल से सलाह लिया करते थे ।

कौन थे बीरबल :

बीरबल का असली नाम महेश दास तथा पूरा नाम महेश दास भट्ट था । मुगल बादशाह अकबर के प्रशासन में मुगल दरबार का प्रमुख विज़ीर (वज़ीर-ए-आजम) थे और अकबर के परिषद के नौ सलाहकारो में से एक सबसे विश्वस्त सदस्य थे । अकबर के अलावा यह दूसरे व्यक्ति थे जिन्होंने दीन- ए -इलाही धर्म माना था।

अकबर के दरबार में बीरबल का ज्यादातर कार्य सैन्य और प्रशासनिक थे तथा वह सम्राट का एक बहुत ही करीबी दोस्त भी था, सम्राट अक्सर बुद्धि और ज्ञान के लिए बीरबल की सराहना करते थे। ये कई अन्य कहानियो, लोककथाओं और कथाओ की एक समृद्ध परंपरा का हिस्सा बन गए हैं।

ये कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। अकबर ने बीरबल को ‘राजा’ पदवी दी थी। बीरबल उतना प्रभावशाली सेनापति से ज़्यादा एक प्रभावशाली कवि थे । कुछ इतिहासकारों ने बीरबल को राजपूत सरदार बताया है। अकबर ने बीरबल को ‘राजा’ और ‘कविराय’ की उपाधि से सम्मानित किया था।

अकबर के प्रसिद्ध मंत्रियों में ‘बीरबल’ का नाम विख्यात है। यह निर्विवाद है कि अकबर अपनी वाक्यचातुर्य तथा विनोदप्रियता में विख्यात थे । कालांतर में इतनी अधिक प्रसिद्धि पाने पर भी उनके जीवन चरित्र के कहीं प्रामाणिक आधार नहीं मिलते और विशेष रूप से जीवन की प्रारंभिक अवस्था के बारे में। अबुल फजल ने ‘आइने अकबरी’ में उनके विषय में पर्याप्त लिखा है, लेकिन प्रारंभिक जीवन के विषय में कोई संकेत नहीं दिया।

बीरबल के नाम और जन्म स्थान को लेकर इतिहासकारो में मतभेद हैं । कवि भूषण ने अपने ग्रन्थ शिवराज भूषण में बीरबल को घाटमपुर तहसील के तिकवांपुर नामक गॉव का निवासी बताया है किन्तु स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार बीरबल दहिलर नामक गॉव के निवासी थे- चूँकि दहिलर और तिकवांपुर पास-पास ही स्थित हैं अतः इस विवाद में अधिक गुंजाइश नहीं है | शिव सिंह सरोज के अनुसार, बीरबल कान्यकुम्बज ब्राह्मण थे-बताया जाता है कि बीरबल का वास्तविक नाम ब्रह्मा था और इनके पिता का नाम गंगा दास था |

सम्राठ अकबर बीरबल के ज्ञान और हाजिर जबावी से इतना अधिक प्रभावित थे कि उन्होंने बीरबल को सेवक नहीं, एक अंतरंग मित्र का स्थान दे रखा था | कहा जाता है कि हिन्दू धर्म के प्रति अकबर कि उदारता और सहीसुणता बीरबर कि प्रेरणा कि वजह से ही थी |

सम्राट अकबर बीरबल से कितना अधिक प्रभावित थे और उनकी कितनी इज़्ज़त करता थे , इसका उल्लेख अबुलफजल ने अकबरनामा में कई जगह किया है- बीरबल भी पूर्णरूपेण सम्राट अकबर के प्रति समर्पित थे । उन्हें अकबर कि न सिर्फ बौद्धिक पिपासा शांत कि बल्कि विभिन्न युद्धों में भाग लेकर अकबर के साम्राज्य विस्तार में भी उन्होंने सक्रिय योगदान दिया ।

बीरबल की धर्मप्रियता के प्रमाण उनके द्वारा बनाये गये मंदिर हैं- अपने सम्राट अकबर के नाम पर उन्होंने यमुना नदी के किनारे अकबरपुर नाम का एक गॉव बसाया जो अब बीरबल का अकबरपुर के नाम से प्रसिद्ध है और कानपूर देहात जिले के घाटमपुर तहसील में स्थित है । बीरबल ने यहाँ देवी-देवताओं के कई मंदिर बनवाए जिनके खंडर आज भी यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं | अ

पने गॉव के पास कानपूर-हमीरपुर मुख्य मार्ग के किनारे सचेंडी नामक गॉव में इन्होने भगवान शंकर के एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया और उस मंदिर के सञ्चालन के लिय आस-पास के अस्सी गॉवों से वृत्ति बांध दी । यह मंदिर बेरबलेशवस महादेव का मंदिर कहलाया और आज वीरेवर महादेव के मंदिर के रूप म मशहूर है ।

बीरबल की पत्नी की मौत काफी पहले ही हो गया थी । बीरबल के दो पुत्र और एक पुत्री थी । इनकी पुत्री का विवाह मशहूर कवि घाघ के भतीजे आशादत्त के साथ हुआ था । बताते हैं कि बीरबल कि पुत्री बीरबल से भी अधिक बुद्धिमान थी और विकट परिस्तिथियों में इनकी सहायता करती थी | बीरबल की मृत्यु 1586 को पशिमोत्तर प्रान्त की लड़ाई में लड़ते हुए ही हुई थी|

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