किसान मोर्चे के नए दांव से फिर मुश्किल हुई बीजेपी की राह

नई दिल्ली(राजा ज़ैद)। उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं। विधानसभा चुनावो में किसान आंदोलन से बड़े नुक्सान की संभावनाओं को देखते हुए भले ही पीएम नरेंद्र मोदी ने कृषि कानून वापस लेने का एलान कर दिया लेकिन संयुक्त किसान मोर्चे द्वारा सरकार के समक्ष रखी गई 6 शर्तो के बाद अब किसान आंदोलन की समाप्ति की दिशा में नया पेंच पैदा हो गया है।

जैसे कि कयास लगाए जा रहे थे कि विधानसभा चुनाव आते आते भारतीय जनता पार्टी किसान आंदोलन समाप्त कराने के लिए किसी भी लक्ष्मण रेखा को पार करेगी। हुआ भी वैसा ही, शुक्रवार को पीएम नरेंद्र मोदी ने अचानक ही राष्ट्र के नाम अपने संदेश में तीन कृषि कानून वापस लेने का एलान करते हुए आंदोलनकारी किसानो से आंदोलन समाप्त कर अपने घरो को वापस लौटने की अपील कर दी।

पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा कृषि कानूनों के वापस लिए जाने के एलान के बाद बीजेपी को लगा कि अब किसान मान जायेंगे और चंद दिनों में किसान अपने घरो को वापस चले जायेंगे। हालांकि बीजेपी की ख़ुशी निराशा में बदलते देर नहीं लगी और अगले ही दिन संयुक्त किसान मोर्चे ने कृषि कानूनों की वापसी की प्रक्रिया पूरी होने तक सभी कार्यकर्मो को पहले की तरह ही जारी रखने का एलान कर दिया।

इतना ही नहीं संयुक्त किसान मोर्चे ने एलान किया कि एमएसपी पर कानून बने बिना किसान आंदोलन समाप्त नहीं होगा और किसान अभी भी धरना स्थलों पर डंटे रहेंगे व किसान आंदोलन जारी रहेगा।

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इसके बाद रविवार को हुई संयुक्त किसान मोर्चे की बैठक में लिए गए फैसले ने एक बाद फिर बीजेपी के सपनो पर पानी फेर दिया। रविवार को हुई संयुक्त किसान मोर्चे की बैठक के बाद संयुक्त किसान मोर्चे की तरफ से पीएम नरेंद्र मोदी के नाम खुला पत्र लिखकर 6 नई शर्तें रखीं गईं।

इन नई शर्तो में सरकार को तुरंत किसानों से वार्ता बहाल करने, किसानों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने, किसान आंदोलन के दौरान मृत किसानो के परिजनों को मुआवजा देने की व्यवस्था करने और पुनर्वास की व्यवस्था करने की मांग शामिल है।

संयुक्त किसान मोर्चे की तरफ से लगाई गई नई शर्तो के बाद बीजेपी की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ गई हैं। किसान आंदोलन समाप्त कराकर जाट मतदाताओं को मनाने के लिए रणनीति तैयार करके बैठी भारतीय जनता पार्टी के पास फिलहाल अपनी रणनीति को ठंडे बास्ते में डालने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

जानकारों की माने तो यदि यूपी चुनाव से पहले किसान आंदोलन समाप्त नहीं हुआ और बीजेपी जाट मतदाताओं को मनाने में सफल नहीं होती तो उसे चुनाव में कम से कम 100 सीटों पर बड़ा घाटा उठाना पड़ सकता है। खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी को एक एक सीट पर जीत के लिए कड़ी मशक्क्त करनी पड़ेगी।

चुनाव विश्लेषकों का कहना है कि यदि किसान आंदोलन जारी रहा तो 300 से ज़्यादा सीटें जीतने का दावा करने वाली बीजेपी के लिए 125 सीटों का आंकड़ा पार करना भी मुश्किल हो जायेगा।

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ऐसे हालातो में बीजेपी के समक्ष दो बड़ी मुश्किलें हैं। यदि सरकार किसानो की सभी मांगें मान लेती है और एमएसपी पर भी कानून बना देती है तो बीजेपी से उसका वो कोर वोटर नाराज़ होता है जो अब तक पीएम मोदी की सभाओं में मोदी-मोदी के नारे लगाता रहा है। इसका एक ट्रेलर उस दिन देखा जा चुका है जब शुक्रवार को पीएम मोदी ने कृषि कानून वापस लेने का एलान किया तो प्राय बीजेपी के लिए लड़ने वाले यूजर्स ने ही सोशल मीडिया पर बीजेपी को कटघरे में खड़ा करते हुए किसानो के समक्ष सरकार के झुकने पर सवाल उठाये।

वहीँ बीजेपी के लिए दूसरी मुश्किल यह है कि यदि सरकार संयुक्त किसान मोर्चे की सभी मांगें नहीं मानती तो किसान आंदोलन समाप्त नहीं कराया जा सकता। इस बीच सोमवार को लखनऊ में हुई किसान महापंचायत में किसान नेताओं ने साफ तौर पर कहा कि उनकी मांगो में गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टैनी की बर्खास्तगी की मांग भी शामिल है।

फिलहाल देखना है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार कौन सा रास्ता चुनती है। सरकार यूपी और उत्तराखंड का अपना दुर्ग बचाने के लिए किसानो की मांगें मानकर अपने कोर हिंदुत्व वाले वोटर को नाराज़ करना चाहेगी या चुनाव से पहले जाट लैंड के किसानो को मनाने के लिए किसानो की सभी मांगें मानकर किसान आंदोलन समाप्त कराने को प्राथमिकता देगी।

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