बबिता जोसफ की कविता: ‘बजे अंश बांस का, वादन के क्षण’

बजे अंश बांस का
वादन के क्षण,
बहे तेरी सांस ,
जब मुरली के अंग,
स्वरों के स्पंदन से,
झरें निर्झर प्रेम कण,
झूमे तन प्रिय की धुन
ढूंढे उसे प्रेम मुग्ध नयन
छूटे सुख-दुःख , जग के बंधन
बिसरे सुध-बुध तन और मन
बजे हिय में प्रेम की सरगम
बसे मन जब प्रेम रतन,
मिटे निज से अंतर व द्वैत द्वन्द।

तप्त धरा का सुन रुदन,
तुम बरसो ,बन घन सघन,
हिम कण के आलिंगन में
हों परितृप्त ,निर्मल तृण, पर्ण।

भवसागर के मंथन से ,
मिटे विष ,छलके अमृत कुंभ
मन के शोधन से
मिटे अहम् का तम
छूटे तन के बंधन से,
क्षेत्र और क्षण तत्क्षण
मिटे निज से अंतर व द्वैत द्वन्द।

मिटे मोह,लोभ ,क्रोध के क्षण ,
महके अंतर्मन जैसे चंदन वन
परम प्रेम के दर्शन के क्षण
मिटे निज से अंतर व द्वैत द्वन्द।।

— बबिता जोसफ

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