मोदी सरकार के दो साल का रिपोर्ट कार्ड : नौ दिन चले अढ़ाई कोस

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नई दिल्ली ( ज़ाहिद अब्बास ) । मोदी सरकार के 26 मई को दो साल पूरे हो जाएंगे। ऐसा लगता था, मानो कि पिछली सरकार ‘काजल की कोठरी’ में ही रह रही थी। यह कम बड़ी बात नहीं है कि उसी राजनीतिक प्रणाली में काम करते हुए अभी तक इस सरकार ने अपने कुर्ते पर काजल की एक हल्की सी लकीर भी उभरने नहीं दी है। ऐसे में सरकार और उसके फैसलों से जुड़े कई सवाल हैं जो लोगों के मन में हैं। जैसे इस सरकार में कौन से मंत्री ऐसे हैं जो सबसे ज्यादा कॉन्ट्रोवर्सीज में फंसे, किस मंत्री की परफॉर्मेंस सबसे बेहतर रही और कौन उम्मीद पर खरा नहीं उतरा। सरकार के किस फैसले पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ। किसने सरकार पर सबसे ज्यादा हमले किए और कौन विपक्ष की ढाल बना।

स्मृति रहीं मोस्ट कॉन्ट्रोवर्शियल मिनिस्टर:

– पिछले दो साल में मोदी सरकार को विपक्ष ने सबसे ज्यादा HRD मिनिस्टर और उनकी मिनिस्ट्री से जुड़े मामलों में ही घेरा।
– कभी उनकी उनकी खुद की डिग्री पर विवाद हुआ तो कभी उनके बयानों पर।
– एजुकेशन के भगवाकरण से लेकर यूनिवर्सिटीज में जरूरत से ज्यादा दखल देने तक का आरोप स्मृति पर लगा।

ये हैं उनसे जुड़े ताजा विवाद:

– हैदराबाद यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट रोहित वेमुला सुसाइड मामले में उनके ऊपर जरूरत से ज्यादा दखल देने, यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट पर दबाव डालने का आरोप लगा।
– जेएनयू कैंपस में देश विरोधी नारेबाजी और कन्हैया पर लगे आरोपों के दौरान भी उनकी मिनिस्ट्री सुर्खियों में रही।
– संसद में स्मृति के भाषणों पर भी हंगामे हुए। राज्यसभा में मायावती के आरोपों का जवाब देते हुए उन्होंने यह तक कह दिया कि अगर वे जवाब से संतुष्ट नहीं हुईं तो ‘सिर काट कर चरणों में रख दूंगी’। इस पर भी जमकर विवाद हुआ।

मोदी का काम इसलिए आसान हो जाता है क्योंकि यह देश अब भी मानकर चल रहा है कि उनके पास देश के गंभीर सवालों के जवाब मौजूद हैं. इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है. तीसरे साल में मोदी का प्रदर्शन जैसा रहेगा, वही उनके दूसरे कार्यकाल की नींव तैयार करेगा.

अच्छा:
वैश्विक नेताओं से मुलाकात करके दुनिया में भारत की सकारात्मक छवि बहाल की; भ्रष्टाचार पर कड़ी लगाम और सरकार में पारदर्शिता; इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण क्षेत्रों पर ज्यादा जोर

बुरा:
देशभक्ति और गोमांस प्रतिबंध जैसे समाज को बांटने वाले मसलों पर खुलकर और फौरन बोलने से परहेज; संसद में विपक्ष से तालमेल और विधायी खाई को पाटने में अक्षम; दिल्ली और बिहार में चुनावी हार का सामना

डिलिवरी:
नतीजे दिखाने और जवाबदेही के मुरीद, नतीजों को मापने की स्पष्ट दृष्टि और व्यावहारिक नजरिया

टीमवर्क:
अत्यधिक केंद्रीकरण के चलते पीएमओ सबसे ताकतवर बन चुका है, लेकिन अब नतीजे दिखाने के लिए मंत्रियों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। लोकसभा चुनावों के दौरान चले विज्ञापन ‘मोदी जी को लाने वाले हैं, अच्छे दिन आने वाले हैं’….लोगों के भीतर कुछ इस हद तक अपना प्रभाव छोड़ गया कि भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव 2014 में अप्रत्याशित जीत हासिल की।

दरअसल पूरा का पूरा चुनाव महज एक चेहरे पर जीत लिया गया। और वो चेहरा था भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री ‘नरेंद्र दामोदर दास मोदी।’ लेकिन केंद्र में मौजूद एनडीए सरकार के दो वर्ष का कार्यकाल पूरा होने पर लोगों के जहन में अच्छे दिनों को लेकर सवाल भी है तो एसोचैैम ने करीबन लोगों को इस बात का जवाब देने की कोशिश भी की है।

आईये जानते हैं मोदी सरकार का दो सालों का रिपोर्ट कार्ड क्या रहा? मॉडल की तर्ज पर विकास कितना? गुजरात को विकास मॉडल की तर्ज पर पेश करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को एक ख्वाब से रूबरू कराया कि भारत कैसे कुछ अलग दिख सकता है, एक नई सरकार के साथ। जिस पर लोगों ने विश्वास की मुहर भी लगा दी।

हालांकि डिजिटल इंडिया, उज्जवला योजना, जन-धन योजना, फसल बीमा योजना आदि ढ़ेर सारी योजनाओं को पीएम नरेंद्र मोदी ने जनता के सामने भी रखा। लेकिन जनता का मानना है कि केंद्र सरकार की योजनाएं आम व्यक्ति तक बमुश्किल ही पहुंची हैं, इस ओर ध्यान देना अनिवार्य है कि जनता को इन योजनाओं का फायदा मिल सके। कितनी हुई प्रगति?

एसोचैम ने मोदी सरकार के अब तक के काम को 10 में से 07 अंक देते हुए कहा है कि सरकार का काम प्रगति पर है। देश की व्यापक आर्थिक स्थित पर एसोचैम ने कहा, ‘निश्चित रूप से सड़क, राजमार्ग, रेलवे और उर्जा क्षेत्र में कुछ साहसिक कदमों को उठाकर इकॉनॉमी को संभाला गया है।’

हालांकि सरकार ने देश की बड़ी ग्रामीण जनसंख्या और कृषि क्षेत्र के सामने मौजूद समस्याओं से निपटने के लिए आक्रामक नीति अपनाई है। ‘कार्य प्रगति पर है’ एसोचैम के अध्यक्ष सुनील कनोडिया के मुताबिक, कर विवादों के निस्तारण, कृषि सुधार, विनिवेश और महत्वपूर्ण जीएसटी विधेयक पर सरकार को अभी बहुत काम करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि एनडीए सरकार को ‘कार्य प्रगति पर है’ वाली सरकार कहना ठीक होगा, जब तक कि रेलवे और राजमार्ग क्षेत्र में किए गए कामों का परिणाम सामने नहीं आ जाता। सवाल जिन्हें मुद्दा बना दिया गया! पीएम मोदी ने किसानों को योजनाओं के जरिए किसानों को खासा लाभान्वित करने की ओर पहल की है। फिर वो फसल बीमा योजना के जरिए हो या फिर जीवन ज्योति बीमा, नीम कोटेड यूरिया के माध्यम से।

उधर, लोगों की ओर से हो या फिर अन्य विपक्षी सियासी दलों की ओर से चंद सवालों पर अभी भी घेराबंदी करने की कोशिश जारी है। जैसे कि लोगों के खाते में 15-15 लाख लाने के एक उदाहरण, डिजिटल इंडिया पर कांग्रेस द्वारा अपना हक जताने की कोशिश आदि। इन सब में प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों पर सबसे ज्यादा सवाल खड़े किए गए।

यदि अभी चार राज्यों एवं एक केन्द्र शासित प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों को नरेंद्र मोदी की सरकार के पिछले दो सालों के कामों पर दिया गया जनमत मान लिया जाये तो निश्चित रूप से निष्कर्ष उनके पक्ष में जायेंगे। यदि इस सरकार के कामों की तुलना पिछली सरकार के कामों से करके उत्तर तलाशा जायेगा, तो यह उत्तर भी ‘सफल एवं संतोषजनक कार्यकाल’ का ही होगा। लेकिन अब हम आते हैं उन बातों पर, जो वाकई हुए हैं, और उन बातों पर भी, जो नहीं हुए, लेकिन होने चाहिए थे।

काले धन के उत्पादन की प्रक्रिया की गति धीमी पड़ी:

इसी प्रकार न तो काला धन कम हुआ है और न ही विदेशों में रखा काला धन देश में लौट पाया है, लेकिन काले धन के उत्पादन की प्रक्रिया की गति जरूर धीमी पड़ी है। जिस दिन भ्रष्टाचार में यह कमी प्रशासनिक स्तर पर दिखाई देने लगेगी, उस दिन से देश के विकास के इतिहास का एक नया पन्ना खुल जायेगा।

मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया जैसी योजनायें अभी तक रोजगार उपलब्ध करा पाने में समर्थ नहीं:

‘मेक इन इंडिया’ तथा ‘स्टार्ट अप इंडिया’ जैसी योजनायें भविष्य की आर्थिक स्थितियों के प्रति आशा पैदा करती हैं। इनसे युवाओं में एक जोश भी आया है। लेकिन दुर्भाग्य से ये योजनायें अभी तक रोजगार उपलब्ध करा पाने में समर्थ नहीं हो पाई हैं। फिर भी आधारभूत संरचना तथा ऊर्जा के क्षेत्र में जिस तेजी और तन्मयता से कामों की शुरुआत हुई है, उसमें रोजगार की संभावनायें देखी जा सकती हैं।

स्वच्छता अभियान’ पूववर्ती सरकार की ‘निर्मल ग्राम योजना’ की ‘नई पैकेजिंग’:

भले ही कुछ लोग मोदी सरकार के ‘स्वच्छता अभियान’ को पूववर्ती सरकार की ‘निर्मल ग्राम योजना’ की ‘नई पैकेजिंग’ कहें, लेकिन इस सरकार ने जिस प्रकार इस योजना को एक जन आंदोलन का रूप दिया है, वह उसकी कार्यप्रणाली की अपनी विशिष्टता है। इसे एक ‘राजनीतिक निर्णय का लोकतांत्रिकीकरण’ कहा जा सकता है, जो जरूरी भी है। जनधन योजना, मुद्रा बैंक, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना तथा राष्ट्रीय कृषि बाजार की स्थापना के पीछे यही जनतांत्रिक सोच काम कर रही है।

पाकिस्‍तान रक्षात्मक रुख अपनाने को विवश हुआ:

पाकिस्तान के साथ हमारे संबंध भले ही बेहतर न हुये हों, लेकिन पीएम मोदी ने विदेश नीति की अपरम्परागत शैली से उसे अन्तरराष्ट्रीय मंच पर ‘रक्षा की मुद्रा’ अख्तियार करने के लिए तो मजबूर कर ही दिया है। चीन को साधना वैसे भी किसी के लिए आसान नहीं है। लेकिन अमेरीका, जर्मनी, फ्रांस, जापान तथा आस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ भारत की बढ़ी हुई नजदीकियों ने विश्व में उसकी छवि में इजाफा किया है। विदेशों में रह रहे आप्रवासी भारतीयों को भावनात्मक स्तर पर देश से जोड़ने के उनके प्रयास भी रंग ला रहे हैं। हां, नेपाल के मामले में फिलहाल असफलता जरूर दिखाई दे रही है।

मोदी सरकार को इस मुद्दे पर मिलेंगे माइनस मार्क:

जिस एक बात को लेकर मोदी जी की सरकार की माइनस मार्किंग की जा रही है, वह है ‘सबका साथ सबका विकास’ के वादे के अनुरूप सामाजिक बुनावट को मजबूत न बना पाना। कारण चाहे जो भी रहे हों, लेकिन देश की परम्परागत समरसता में कुछ खटास आई है। शायद असम चुनाव की सफलता उनकी पार्टी को इस मामले पर नये, अधिक तार्किक एवं व्यावहारिक स्तर पर सोचने के लिए प्रेरित करे।

पीएम ने अपने कामों से लिया सबक:

मोदी के दूसरे साल में यह साफ है कि उन्होंने अपने काम से सबक लिया है और अपनी सीमाओं के भीतर कहीं ज्यादा रचनात्मक हुए हैं । हालिया बजट में गरीबों और किसानों के प्रति स्पष्ट समर्थन देखने को मिला, जिसने विपक्ष की इस आलोचना को खारिज कर दिया कि यह ‘सूट-बूट की सरकार’ है ।

उन्होंने आजादी के बाद अब तक की सबसे बड़ी किसान बीमा योजना का उदघाटन किया, जिससे फसल के नुक्सान होने पर किसानों को सुरक्षा मिल सकेगी और सिंचाई योजनाओं का प्रसार हो सकेगा, साथ ही वित्तीय संतुलन भी कायम रखा जा सकेगा ।

कृषि क्षेत्र के लिए यह कदम बड़ी राहत के रूप में सामने आया है क्योंकि उनकी सरकार को भले ही पेट्रोलियम तेल की कम कीमतों के कारण थोड़ी आसानी हुई हो, लेकिन मोदी को दो साल तक लगातार खराब मॉनसून की विरासत भी मिली थी जिससे उन्हें निपटना था । यह 30 साल में पहली बार पड़ा दोहरा सूखा है, जिसने अधिकांश ग्रामीण भारत को दरिद्र बना दिया है. इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था लगभग ठप्प हो गई है ।

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