गुजरात के इस गांव में नहीं है दलित महिलाओं को कुएं से पानी लेने की इजाज़त

गुजरात के इस गांव में नहीं है दलित महिलाओं को कुएं से पानी लेने की इजाज़त

यूँ तो स्वयं प्रधानमंत्री भी देश को गुजरात मॉडल की तर्ज पर विकसित करने की पैरवी करते रहे हैं लेकिन गुजरात के मेहसाणा जिले के एक गाँव में आज भी दलितों को ऊँची जाति के लोगों के कुएं से पानी भरने की इजाज़त नहीं है ।

Mehsana

मेहसाणा। चिलचिलाती गर्मी में पानी के इतने पास होने के बावजूद भी मेहसाणा के बेचाराजी गांव में दलित महिलाओं को अपनी प्यास बुझाने की इजाजत नहीं देती। 20 हजार लोगों के इस गांव में ऐसे 200 दलित परिवार हैं जो हर रोज अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी के इतने पास होने के बावजूद भी किसी के आने का घंटो इंतजार करना पड़ता है। कुआं अशुद्ध न हो जाए इस कारण उच्च वर्गीय महिलाएं इन दलित महिलाओं को खुद से पानी निकालने नहीं देती।

1927 में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने महाद सत्याग्रह’ का शुभारंभ किया था, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक पानी की टंकी से पानी निकालने के लिए दलितों का नेतृत्व किया। वह यह संदेश देना चाहते थे कि कोई भी अछूत नहीं हैं। पर मेहसाणा के इस गांव की यह परंपरा जो पिछले नौ दशकों से चली आ रही है, यह सिद्ध करती है कि बाबा साहेब अंबेडकर का काम अधूरा ही रह गया।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह गांव पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम आनंदीबेन पटेल के गृह राज्य में पड़ता है। देश में जहां एक तरफ दलितों और बाबा साहेब पर राजनीति की जा रही है वहीं दूसरी ओर दलितों की इस तरह की परेशानियों को नजरअंदाज किया जा रहा है। इस तरह की घटनाओं को प्रथा-परंपरा का नाम दिया जाता है।

गांव की एक महिला का कहना है कि पानी के लिए सबसे पहले अपना नंबर लगाने के बाद भी हमें (दलित महिलाएं) घंटो पानी के लिए इंतजार करना पड़ता है। उच्च जातिय महिलाओं के सामने गिड़गिडा़ना पड़ता है या किसी दयालु महिला की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। वे हमारे पानी के बर्तनों में ऊंचाई से पानी डालती है ताकि उनके बर्तन भी अपवित्र न हो जाये। देश में आज भी परंपरा के नाम पर दलितों के साथ भेदभाव की घटनायें आये दिन सामने आती रहती हैं।

गांव में दलित अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता कौशिक परमार कहते हैं सरकार को अंबेडकर के नाम पर कार्यक्रम आयोजित करने के बजाय कुएं से पानी निकालने की इजाजत देकर जाति की दीवारों को तोड़ने पर ध्यान देना चाहिए।

गर्मी के कारण जहां देश के कई हिस्सों में सूखा पड़ रहा है वहीं यहां के लोग पानी होते हुए भी पानी का इंतजार करते हैं। दूसरी ओर गांव के सरपंच कानूभाई भारवड़ के पिता कहते हैं कि हम दलितों को कुएं से पानी निकालने की अनुमति नहीं देते। यह हमारी परंपरा है और हम इसे मानते हैं।

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TeamDigital