बबिता जोसफ की कविता: मैं भी हूं एक इंसान

मैं भी हूं एक इंसान ,
तुम्हारी ही तरह उस
परमपिता की संतान
न जाने किसने छीन ली
मुझसे मेरी ही पहचान।

न रोटी है ,न कपड़ा है,
न है मेरा कोई मकान,
जन्मा हूँ फुटपाथ पर
जाऊं कहाँ, नहीं है ,
मेरा कोई मुकाम
क्यों है मेरी दुनिया वीरान।

कभी मैं समझ न पाया ,
ये जिंदगी का इम्तिहान ,
कभी समझा न पाया ,
मैं कैसा अभागा इंसान।

कभी एक रोटी को तरसता है तन,
कभी यातनाओं में सिसकता है मन,
हर ख्वाहिश पे निकलता है दम,
जख्मी हृदय से रिसते हैं गम,
शुष्क अधरों पे रात भर बरसते नयन,
फिर भी प्यासा रह जाता है मन।

बदलो अपनी सोच को ,
जिसने बनाया मुझे,
मोहताज और बेजुबान,
मेरे दुःखों से अब न रहो अनजान।

भीख नहीं, मिले समाज में स्थान
सिर्फ रोटी ही से कब जी पाता इंसान
मिटे समाज के सारे भेद ,
हर इंसान हो एक समान
मिले मुझे सदियों से ,
खोया मेरा आत्मसम्मान।

खोलो सारे बंधन मेरे,
बाहें खोल मैं ऊड़ूँ उड़ान।
कुछ नया करूँ,नायाब करूँ,
श्रम कण से हर लम्हों पे,
लिख दूँ अपना नाम,
मिले मुझे भी एक पहचान,
अब सहा न जाए और अपमान ।

जुड़ूं समाज की मुख्य धारा से,
करूँ विकास में योगदान ,
मिले मुझे भी एक पहचान
पैमाने बदल दूँ, कामयाबी के
ऊंचा और भी करुं आसमान।

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निर्धनता नहीं है दैवीय अभिशाप,
ये तो है एक मानवीय सृजन
तुम्हारे असंतोष ने ही जन्मा है,
मुझे और मेरे जैसे कई निर्धन।

कोरी योजनाऐं नहीं,
करो सियासतें भी नहीं
कोसो समय को नहीं,
बनो परिवर्तनहीन नहीं।

उमड़े चारो दिशा ,
समानता का जलवान
मिटें भेद , मिटें अज्ञान ,
मिटें झुठे अभिमान,
हर इंसान हो एक समान।

मैं भी हूँ एक इंसान ,
तुम्हारी ही तरह उस ,
परमपिता की संतान ।

–बबिता जोसफ

अपनी कविताओं से हिंदी काव्य के क्षेत्र में पहचान अर्जित करने वाली बबिता जोसफ सामयिक विषयो को पंक्तियों के माध्यम से रेखांकित करने के लिए जानी जाती हैं। वे अपनी कविताओं में दुनिया की वर्तमान स्थितियों और परिस्थितियों का सजीव चित्रण करती हैं। बबिता जोसफ ने अपनी नई कविता ‘मैं भी हूं एक इंसान’ में गरीबी से जद्दोजहद का मार्मिक चित्रण किया है।

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