2019 आम चुनाव: जीते तो मोदी, हारे तो बीजेपी या कुछ और ?

2019 आम चुनाव: जीते तो मोदी, हारे तो बीजेपी या कुछ और ?

नई दिल्ली (राजाज़ैद)। 2019 के लोकसभा चुनाव में अभी खासा समय बाकी है लेकिन यदि आगामी आम चुनावो में बीजेपी की पराजय हुई तो आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस वक़्त किस भूमिका में रहेंगे, इसका विश्लेषण कर रहे हैं हमारे समूह सम्पादक राजा ज़ैद।

हाल ही में गुजरात में सम्पन्न हुए विधानसभाओं के नतीजे इस बात की तरफ इशारा कर रहे हैं कि अगले आम चुनावो में 2014 के आम चुनावो से स्थति कहीं अधिक भिन्न होगी। हालाँकि अभी चुनावो में समय बाकी है लेकिन सरकार के अब तक कामकाज पर नज़र डाली जाए तो आज दिन तक सरकार के पास कोई ऐसी ठोस उपलब्धि नहीं है जिसे वह अगले आम चुनावो में जनता के समक्ष उदाहरण बतौर रखकर फिर से सत्ता में आने के लिए वोट मांग सके।

मोदी सरकार के कार्यकाल के साढ़े तीन वर्ष बीत चुके हैं। सरकार की तरफ से ड्रीम प्रोजेक्ट बनकर पेश की गयी अधिक तक योजनाऐं कोई बड़ी छाप नहीं छोड़ पाई हैं। नमामि गंगे, स्टार्टअप इंडिया, स्मार्ट सिटी और मेक इन इंडिया ये सभी योजनाएं बेहद धीमी गति से चल रही हैं और लगता है कि मोदी सरकार के कार्यकाल की समाप्ति तक इन योजनाओं में बहुत प्रगति मुमकिन नहीं है।

2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने महंगाई, भ्रष्टाचार, काला धन, बेरोज़गारी और सुरक्षा जैसे मुद्दों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर चुनाव लड़ा था आज उन्ही मुद्दों पर स्वयं बीजेपी कटघरे में खड़ी नज़र आ रही है।

यदि आज दिन तक का आंकलन किया जाए तो यूपीए सरकार के कार्यकाल की तुलना में महंगाई कम होने के स्थान पर और बढ़ी है। विदेशो से काला धन वापस लाने और देश से भ्रष्टाचार समाप्त करने के अहम वादों पर भी मोदी सरकार सफल सिद्ध नहीं हुई है। न विदेशो से काला धन वापस आया है और न ही देश से भ्रष्टाचार समाप्त हुआ है। जहाँ तक बेरोज़गारी का सवाल है तो भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रतिवर्ष दो करोड़ लोगों को रोज़गार देने का वादा किया था लेकिन मोदी सरकार रोज़गार के मामले में यूपीए सरकार की तुलना में फिसड्डी साबित हुई है।

सीमा पर सुरक्षा के मुद्दे पर यदि मोदी सरकार का आंकलन किया जाए तो यूपीए सरकार की तुलना में मोदी सरकार के कार्यकाल में पाकिस्तान की तरफ से सीज फायर के उल्लंघन की घटनाओं बढ़ोत्तरी हुई है , इतना ही नहीं आतंकी हमलो और सीमापार से गोलीबारी में शहीद हुए सैनिको की तादाद भी यूपीए सरकार से कहीं अधिक है।

कुल मिलाकर सभी मुद्दों पर जो स्थति दिख रही है उसे यूपीए सरकार की तुलना में बेहतर तो कहीं से भी नहीं कहा जा सकता। इसके बावजूद सरकार की तरफ से निरंतर विकास के दावे होते रहे हैं।

फ़िलहाल एक बड़ा सवाल यह है कि यदि आगामी लोकसभा चुनाव (2019) में यदि भारतीय जनता पार्टी की पराजय होती है तो आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस वक़्त क्या भूमिका होगी ? क्या वे विपक्ष के नेता के तौर पर पार्टी के लिए बड़ी भूमिका निभाएंगे या गुजरात की राजनीति में वापस कदम खींच लेंगे अथवा कुछ समय के लिए ब्रेक लेंगे ?

यदि यह सवाल किसी बीजेपी नेता से किया जाए तो वह इसका जबाव गंभीरता से नहीं देगा। शायद वह स्वीकार ही न करे कि आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी को शिकस्त का सामना भी करना पड़ सकता है।

बीजेपी में अटल बिहारी वाजपेयी ने लम्बे समय तक सत्ता तक नहीं पहुँच सके। वे अपने राजनैतिक सफर के दौरान अधिकांश समय विपक्ष की कुर्सी पर बैठे। वाजपेयी वर्ष 1957 में पहली बार लोकसभा चुनाव जीते थे और बीस वर्षो तक सत्ता से दूर रहे। वे पहली बार 1977 से 1979 तक मोरारजी देसाई सरकार में विदेश मंत्री रहे। इसके बाद पुनः वाजपेयी को 17 वर्षो तक विपक्ष में ही रहना पड़ा। वाजपेयी पहली बार वर्ष 1996 में 16 मई से 1 जून तक के लिए प्रधानमंत्री बने। उसके बाद वे पुनः 19 मार्च 1998 से 22 मई 2004 तक प्रधानमंत्री रहे।

अटल बिहारी वाजपेयी की तरह ही बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने भी अपने राजनैतिक जीवन का एक बड़ा समय विपक्ष के सांसद के तौर पर गुजारा लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्थति इससे कहीं भिन्न है। वे 1980 के दशक में भारतीय जनता पार्टी की गुजरात इकाई में शामिल हुए थे और महज 8 वर्षो में ही उन्हें गुजरात बीजेपी का महासचिव बनाया गया।

इतना ही नहीं मोदी को 1995 में भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय सचिव और पांच राज्यों का पार्टी प्रभारी बनाया गया. इसके बाद 1998 में उन्हें महासचिव (संगठन) बनाया गया। वर्ष अक्टूबर 2001 में पहली बार सीधे गुजरात के मुख्यमंत्री बने, और वर्ष 2012 तक लगातार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। कुल मिलाकर कहा जाए तो नरेंद्र मोदी अभी तक विपक्ष में नहीं बैठे हैं।

ऐसे ये सवाल उठना लाजमी है कि यदि 2019 के आम चुनावो में बीजेपी की पराजय हुई तो क्या नरेंद्र मोदी विपक्ष के नेता का पद स्वीकार करेंगे अथवा उनकी भूमिका कुछ और होगी ?

TeamDigital