पुणे में शौर्य दिवस का जश्न मना रहे दलितों पर हमला, एक की मौत, मुंबई में भी तनाव
पुणे। महाराष्ट्र के पुणे में “भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह के अवसर पर जश्न मनाने के लिए जुटे दलितों पर मराठा संगठन के लोगों द्वारा बोले गए हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गयी तथा कई अन्य लोग घायल हुए हैं।
यह हिंसा मंगलवार को भी जारी है। मंगलवार को मुंबई के अलावा, हड़पसर व फुरसुंगी में बसों पर पथराव किया गया। इसके बाद औरंगाबाद और अहमदनगर के लिए बस सेवा निरस्त कर दी गई। इसके अलावा ट्रेन सर्विस भी प्रभावित हुई है।
बता दें कि पुणे में 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव युद्ध के 200 साल पूरे होने पर लाखों की संख्या में दलित शौर्य दिवस मनाने इकट्ठा हुए थे। इसी दौरान भीड़ की शक्ल में सैकड़ो लोगों ने कार्यक्रम स्थल की तरफ कुछ किया। जिसके बाद हिंसक घटनाएं और आगजनी हुईं। इस घटना के बाद मुंबई में भी तनाव है और प्रशासन ने एहतियात के तौर पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है।
वहीं इस हिंसा के लिए एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने दक्षिणपंथी संगठनों की जिम्मेदार बताया है और आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है। पवार ने कहा कि भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह मनाई जा रही थी। हर साल यह दिन बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता रहा है लेकिन इस बार कुछ दक्षिणपंथी संगठनों ने यहां की फिजा को बिगाड़ दिया।
वहीं, कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भीमा-कोरेगांव में हिंसा साजिश के तहत फैलाई गई। मुंबई कांग्रेस के डॉ. राजू वाघमारे ने कहा कि पहले से दलितों पर हमले करने की प्लानिंग थी। आरएसएस के कुछ लोग यहां हिंसा भड़काने के लिए लंबे समय से तैयार कर रहे थे।
क्या है भीमा-कोरेगांव की लड़ाई:
200 साल पहले 1818 में पेशवा को अंग्रेजों ने दलितों के साथ मिलकर हराया था। भीमा कोरेगांव की लड़ाई 1 जनवरी 1818 को पुणे स्थित कोरेगांव में भीमा नदी के पास उत्तर-पू्र्व में हुई थी। यह लड़ाई महार और पेशवा सैनिकों के बीच लड़ी गई थी।
अंग्रेजों की तरफ 500 लड़ाके, जिनमें 450 महार सैनिक थे और पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28,000 पेशवा सैनिक थे, मात्र 500 महार सैनिकों ने पेशवा की शक्तिशाली 28 हजार मराठा फौज को हरा दिया था।
महार सैनिकों को उनकी वीरता और साहस के लिए सम्मानित किया गया और उनके सम्मान में भीमा कोरेगांव में स्मारक भी बनवाया। जिन पर महारों के नाम लिखे गए। इसके बाद से पिछले कई दशकों से भीमा कोरेगांव की इस लड़ाई का महाराष्ट्र के दलित जश्न मनाते आ रहे हैं।
हर साल नए साल के मौके पर महाराष्ट्र और अन्य जगहों से हजारों की संख्या में पुणे के परने गांव में दलित पहुंचते हैं। यहीं वो जयस्तंभ स्थित है जिसे अंग्रेजों ने उन सैनिकों की याद में बनवाया था। जिन्होंने इस लड़ाई में अपनी जान गंवाई थी। कहा जाता है कि साल 1927 में डॉ. भीमराव अंबेडकर इस मेमोरियल पर पहुंचे थे। जिसके बाद से अंबेडकर में विश्वास रखने वाले इसे प्रेरणा स्त्रोत के तौर पर देखते हैं।
