वक़्फ़ संशोधन कानून पर सुप्रीमकोर्ट में तीसरे दिन भी सुनवाई जारी

वक़्फ़ संशोधन कानून पर सुप्रीमकोर्ट में तीसरे दिन भी सुनवाई जारी

नई दिल्ली। वक़्फ़ संशोधन कानून को लेकर सुप्रीमकोर्ट में आज तीसरे दिन भी सुनवाई जारी है। आज सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता कोर्ट में दलीलें पेश कर रहे हैं।

सीजेआई बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की पीठ के समक्ष तुषार मेहता ने कहा कि किसी के लिए भी मुद्दा उठाना मुश्किल नहीं है, लेकिन सिर्फ इसलिए कि इस पर बहस की जा सकती है, इसका मतलब यह नहीं है कि ये विधायिका की तरफ से पारित कानून की वैधता पर रोक लगाने योग्य है।

मेहता ने कहा कि वक्फ अल्लाह के लिए है, ये हमेशा के लिए है। अंतरिम आदेश के मकसद से, अगर इसे असंवैधानिक पाया जाता है, तो इसे रद्द किया जा सकता है लेकिन अगर वक्फ है, तो वह वक्फ ही रहेगी। जेपीसी ने कहा है कि आदिवासी इस्लाम का पालन कर सकते हैं, लेकिन उनकी अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है। मेहता ने कहा कि कानून गैर-मुस्लिम को वक्फ दान देने से वंचित नहीं करता. यही कारण है कि 5 साल -आपको यह दिखाना होगा कि आप मुस्लिम हैं और वक्फ के इस तरीके का इस्तेमाल धोखाधड़ी के लिए नहीं करते हैं।

सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने क्या कहा:

तुषार मेहता ने कहा कि 1923 से 2013 तक-कोई भी मुस्लिम वक्फ बना सकता था. 2013 में कोई भी मुस्लिम हटा दिया गया और कोई भी व्यक्ति डाल दिया गया। इस पर न्यायधीश मसीह ने कहा कि ये इस्लाम को मानने वाले व्यक्ति तक ही सीमित था। मेहता ने कहा कि अगर मैं हिंदू हूं और वाकई वक्फ बनाना चाहता हूं, तो मैं ट्रस्ट बना सकता हूं। अगर हिंदू मस्जिद बनाना चाहता है, तो वक्फ क्यों बनाए, जब आप सार्वजनिक धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए ट्रस्ट बना सकते हैं तो फिर कुछ और क्यों।

मेहता ने कहा कि 2013 में गैर-मुस्लिमों को वक्फ बनाने की अनुमति दी गई थी जबकि 1923 से 2013 तक ऐसा नहीं था। मेहता की बात पर सिब्बल ने विरोध जताते हुए कहा कि ऐसा नहीं है, 2010 में ही सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि गैर-मुस्लिम व्यक्ति भी वक्फ बना सकता है।

TeamDigital