गुजरात चुनाव को लेकर इसलिए बेचैन है टीम मोदी-शाह
नई दिल्ली। गुजरात में जल्द होने जा रहे विधानसभा चुनावो को लेकर पिछले कुछ दिनों में बीजेपी खेमे में बेचैनी बढ़ी है। बीजेपी खेमे की यह बेचैनी पार्टी के शीर्ष नेताओं के भाषणों से साफ़ दिखाई देती है। हाल ही में एक बड़ा परिवर्तन यह भी देखने को मिला कि जो बीजेपी नेता गुजरात में 150 सीटें जीतने के दावे कर रहे थे अब उनके भाषणों में वह उत्साह और कॉन्फिडेंस नहीं दिख रहा।
अभी हाल ही में भोपाल में सम्पन्न हुई आरएसएस की तीन दिवसीय बैठक में बीजेपी के खिलाफ बढ़ते असंतोष पर चिंता ज़ाहिर की गयी। बताया जाता है कि संघ ने नोट बंदी, जीएसटी, बेरोज़गारी और देश की अर्थ व्यवस्था को लेकर जनता में पैदा हो रहे असंतोष से बीजेपी को अवगत करा दिया है।
गुजरात की सत्ता पर भारतीय जनता पार्टी का पिछले एक दशक से अधिक समय से कब्ज़ा है और पार्टी के लिए इसे आगामी विधानसभा चुनावो में भी बरकरार रखना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चूका है।
जानकारों की माने तो टीम मोदी – शाह की बड़ी चिंता पार्टी के परम्परागत मतदाताओं को लेकर है। गुजरात चुनाव को लेकर बीजेपी नेता बड़े दावे भले ही कर रहे हों लेकिन ज़मीनी हकीकत उनके दावों से मेल नहीं खाती। कभी बीजेपी का कटटर वोट माने जाने वाला पाटीदार समुदाय इस बार बीजेपी के साथ नहीं है। पाटीदार समुदाय के लिए आरक्षण की मांग उठाने वाले हार्दिक पटेल स्वयं अपने समुदाय के लोगों से बीजेपी को वोट न देने की अपील कर रहे हैं।
इतना ही नहीं हार्दिक पटेल पाटीदार बाहुल्य गाँवों में सभाएं करके अपने समुदाय के लोगों को बीजेपी की कमियां बता रहे हैं। हार्दिक पटेल कहते हैं कि पाटीदारो ने बीजेपी को गुजरात की सत्ता में पहुँचाया लेकिन उसके बदले में बीजेपी ने पाटीदारो से गुलामो जैसा व्यवहार किया है। हार्दिक पटेल कहते हैं कि बीजेपी ने पाटीदारो को सिर्फ वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल किया है।
वहीँ टीम मोदी-शाह की दूसरी परेशानी यह भी है कि इस बार आम आदमी पार्टी भी चुनावी मैदान में है। आम आदमी पार्टी का संगठन अभी गाँव देहात में मजबूत नहीं है लेकिंन शहरी इलाको में आम आदमी पार्टी बीजेपी को बड़ा झटका दे सकती है। जानकारों की माने तो आम आदमी पार्टी शहरी इलाको में जो भी वोट काटेगी वे मूलतः बीजेपी के परम्परागत ही होंगे।
टीम मोदी-शाह की तीसरी मुश्किल कांग्रेस के अभियानों को मिल रही बड़ी सफलता है। प्रचार अभियान में इस बार कांग्रेस ने शुरूआती तौर पर बढ़त बना ली है। बीजेपी जिस विकास की दुहाई देती रही है , इस बार कांग्रेस उस “विकास के जुमले” की हवा निकाल चुकी है। शायद यही बड़ा कारण है कि स्वयं पीएम मोदी को अपने भाषण में इमोशल कार्ड खेलना पड़ा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कहा कि कांग्रेस गुजराती लोगों के खिलाफ है। कांग्रेस को गुजरात का विकास नहीं दिखता, उसने गुजरात का अपमान किया है। इतना ही नहीं पीएम मोदी ने जीएसटी लागू करने में कांग्रेस को भी शरीक कर लिया। उन्होंने गुजराती में कहा कि जीएसटी लागू करने का निर्णय केवल उनकी पार्टी का नहीं था, कांग्रेस भी इसमें बराबर की हिस्सेदार है।
जानकारों की माने तो पीएम मोदी के भाषण में पिछले चुनावो जैसा आत्मविश्वास और धार नहीं थी। जिसका सबसे बड़ा कारण वह ज़मीनी हकीकत थी जो बीजेपी के हाथ से खिसक चुकी है।
टीम मोदी-शाह की चौथी मुश्किल गुजरात में दलितों की बीजेपी से नाराज़गी है। ऊना काण्ड के बाद दलितों को आकर्षित करने के लिए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कई राज्यों के दौरों के दौरान भले ही दलितों के साथ भोज किया हो लेकिन इसका पॉजिटिव रिएक्शन गुजरात के दलितों में नहीं दिखा।
गुजरात में ऊना काण्ड के बाद दलित समुदाय के लोगों में बढ़ती जागरूकता और एकता दलित मतदाताओं को बीजेपी से दूर करने की ताकत बन सकती है। ऐसे में जबकि पाटीदार समुदाय पहले ही बीजेपी से दूरी बना चूका है, दलित मतदाताओं का बीजेपी से टूटना पार्टी के लिए बड़ी मुश्किल पैदा कर सकता है।
संघ की रिपोर्ट के बाद बीजेपी ने गुजरात में हिन्दू हार्डलाइनर का एक्सपेरिमेंट भी किया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गुजरात दौरे पर भेजा गया। उनका रोड शो और सभाएं आयोजित की गयीं लेकिन उनका जादू गुजरात के लोगों पर बेअसर साबित हुआ।
गुजरात में डेमेज कंट्रोल जुटी बीजेपी ने कई केंद्रीय मंत्रियों और कुछ बीजेपी शासित राज्य के मुख्यमंत्रियों को गुजरात में चुनावी ज़िम्मेदारी दी है। पार्टी का मानना है कि ज़्यादा लोगों को गुजरात में लगाकर मतदाताओं से निरंतर सम्पर्क बना रह सकता है। बीजेपी सूत्रों की माने तो आने वाले दिनों में कई केंद्रीय मंत्री गुजरात में रेगुलर रूप से प्रतिदिन प्रेस कॉन्फ्रेंस भी सम्बोधित करते दिखेंगे।
हालाँकि अभी गुजरात चुनावो का अभी एलान नहीं हुआ है लेकिन चुनावी जानकारों का कहना है कि इस बार गुजरात में बीजेपी की राह आसान नहीं है और चुनावी परिणाम आने पर उसके दावे बौने साबित हो सकते हैं।
