क्या आरएसएस जगा रहा बीजेपी के दिल में दलित प्रेम, पढ़िए पूरी रिपोर्ट
नई दिल्ली(राजाज़ैद)। दलितों के यहाँ भोजन करने या दलितों के साथ भोजन करने की रस्म अदायगी कोई नया काम नहीं बल्कि राजनीति में यह पहले भी होता आया है। पार्टी कोई भी हो दलितों को रिझाने में कोई भी पार्टी कसर नहीं छोड़ना चाहती।
भारतीय जनता पार्टी में दलित प्रेम जागने का सीधा सीधा मतलब संघ के दिल में दलित प्रेम जागा है। दलितों के यहाँ भोजन करने की रस्म अदायगी के पीछे कोई सामाजिक कारण नहीं बल्कि यह रस्म ही पूर्णतः राजनैतिक है।
उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं को अपनी तरफ खींचने की रस्साकशी ने एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी को मजबूर कर दिया है। यही कारण है कि दलितों के यहाँ भोजन की रस्म अदायगी दलित प्रेम के कारण नहीं बल्कि बीजेपी से दूर हो रहे दलित वोट बैंक को फिर से संजोने की कोशिश है।
हाल ही में दिल्ली में हुई संघ की एक बैठक में सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि सिर्फ दलितों के घर जाने की बजाए उन्हें भी अपने घरों पर बुलाएं। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बीजेपी नेताओं को नसीहत देते हुए कहा है कि सिर्फ दलितों के घर जाकर खाना खाने से कुछ नहीं होगा।
संघ प्रमुख का दलित प्रेम ज़ाहिर करता है कि अगले लोकसभा चुनावो की तैयारी शुरू हो चुकी है और संघ को इस बात का अंदाजा हो चूका है कि यदि दलित बीजेपी से छिटके तो पार्टी को बड़ा नुकसान होगा।
भारतीय जनता पार्टी में एक धड़े के कटटर हिंदूवादी विचारो के चलते 2014 के आम चुनावो के बाद देशभर में दलित वोट बैंक धीमे धीमे बीजेपी से छिटक रहा था। उसका अहम कारण देशभर में हुई दलित विरोधी घटनाएं रही हैं।
गुजरात के ऊना से लेकर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर तक दलितों के साथ हुई घटनाओं से दलित मतदाताओं के एक बड़े धड़े ने बीजेपी से दूरी बना ली थी। देशभर में दलितों पर हमले और दलितों को हाशिये पर धकेले जाने की घटनाओं के बाद कहीं न कहीं भारतीय जनता पार्टी और देश के दलित मतदाताओं के बीच एक गहरी खाई अवश्य पैदा हुई है।
अब संघ के निर्देश पर उत्तर प्रदेश में दलितों के यहाँ भोजन की शुरुआत इस बात का संकेत देता है कि बीजेपी और संघ को यह समझ आ चूका है कि दलित मतदाताओं को नाराज़ करके पार्टी को कई राज्यों में बड़ा नुकसान हो सकता है।
इसी वर्ष कर्नाटक के अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी चुनाव होने है। इन तीनो राज्यों में दलित मतदाताओं की भूमिका को भी अहम माना जाता है। ऐसे में बीजेपी और संघ का दलित प्रेम कोई नई बात नहीं बल्कि चुनावी समीकरणों को व्यवस्थित करने की कोशिश है।
सूत्रों की माने तो दिल्ली में संघ और बीजेपी के शीर्ष नेताओं की बैठक में साफ तौर पर दलित वोट बैंक के पार्टी से दूरी बनाने को लेकर चर्चा हुई। सूत्रों की माने तो उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में योगी सरकार के मंत्रियों में दलित प्रेम जागना पार्टी की रणनीति का हिस्सा है।
यह अलग बात है कि दलित रसोई की जगह खाना होटल या केटरिंग से मंगवाया गया हो लेकिन खाया तो दलित के घर में ही जाएगा। दलित प्रेम दिखाने के लिए भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं से लेकर स्वयं सीएम और मंत्रीगण दलित परिवारों के यहाँ जाकर भोजन कर रहे हैं।
हालाँकि दलितो के यहाँ भोजन करने की रस्म अदायगी में कई जगह विवाद भी पैदा हुआ है। उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार के मंत्री सुरेश राणा पर आरोप लगा कि उन्होंने दलित परिवार के यहाँ एक केटर्स के यहाँ से खाना मंगवाकर खाया।
वहीँ सूत्रों की माने तो संघ ने 2019 के चुनावो में बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगने के संकेत दिए हैं। सूत्रों ने कहा कि बीजेपी को 2014 के लोकसभा में जो वोट मिला उसका एक बड़ा हिस्सा जो सेकुलर विचारधारा और बुद्धजीवियों का है वह पार्टी से दूर जा चूका है। ऐसे में पार्टी को वापस सत्ता में आने के लिए एक बार फिर दलित पिछडो को अपने साथ जोड़ना पड़ेगा।
सूत्रों ने कहा कि बीजेपी से लगातार बढ़ती मतदाताओं की दूरी से संघ खासा चिंतित हैं। सूत्रों के मुताबिक संघ ने बीजेपी को साफतौर पर कहा है कि पार्टी 2014 वाली स्थति में नहीं है ऐसे में उसे आगामी लोकसभा चुनावो में वापसी करने के लिए अभी से हाथ पैर मारने होंगे।
सूत्रों की माने तो संघ ने बीजेपी के शीर्ष नेताओं को अपनी चिंता से अवगत करा दिया है और बीजेपी नेतृत्व को साफ़ तौर पर पुराने वोट बैंक को पार्टी के हाथो से छिटकने से रोकने को कहा है।
फिलहाल देखना है कि बीजेपी और संघ का दलित प्रेम कितने दिन तक ज़िंदा रहता है और क्या दलित समुदाय उन्हें स्वीकार करता है अथवा नहीं ? फिलहाल एक बात बड़े साफतौर पर कही जा सकती है कि 2014 में बीजेपी को जो हिंदुत्व धार वाला वोट मिला था वो कहीं न कहीं 2018 आते आते कम हो रहा है। शायद यही बड़ा कारण है कि संघ बीजेपी नेताओं को दलित मतदाताओं से प्रेम जताने को बाध्य कर रहा है।
