बबिता जोसफ की कविता: ‘भ्रमण उस चाक का न होगा’

बबिता जोसफ की कविता: ‘भ्रमण उस चाक का न होगा’

जब कील ही स्थिर न रह पाए,
भ्रमण उस चाक का न होगा।

कंठ तृषा बुझा सके ,
सृजन उस पात्र का न होगा।

केंद्र में जो स्थिर रह पाए,
भ्रमण चक्रवात में न होगा ।

जब चित्त ही स्थिर न रह पाए,
शमन तृषा का न होगा ।

आत्म क्षुधा बुझा सके,
अर्जन उस क्षण का न होगा।

(बबिता जोसफ)

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