बबिता जोसफ की कविता: ‘भ्रमण उस चाक का न होगा’

जब कील ही स्थिर न रह पाए,
भ्रमण उस चाक का न होगा।

कंठ तृषा बुझा सके ,
सृजन उस पात्र का न होगा।

केंद्र में जो स्थिर रह पाए,
भ्रमण चक्रवात में न होगा ।

जब चित्त ही स्थिर न रह पाए,
शमन तृषा का न होगा ।

आत्म क्षुधा बुझा सके,
अर्जन उस क्षण का न होगा।

(बबिता जोसफ)

अपनी राय कमेंट बॉक्स में दें
ये भी पढ़ें:  दिल्ली : कई राज्यों में MP सहित NIA की बड़ी कार्रवाई
सत्य को ज़िंदा रखने की इस मुहिम में आपका सहयोग बेहद ज़रूरी है। आपसे मिली सहयोग राशि हमारे लिए संजीवनी का कार्य करेगी और हमे इस मार्ग पर निरंतर चलने के लिए प्रेरित करेगी। याद रखिये ! सत्य विचलित हो सकता है पराजित नहीं।
ताज़ा हिंदी समाचार और उनसे जुड़े अपडेट हासिल करने के लिए फ्री मोबाइल एप डाउनलोड करें अथवा हमें फेसबुक, ट्विटर या गूगल पर फॉलो करें